रविवार, दिसंबर 28, 2008

aadhe adhoore

मुफलिसी की दौड़ में चंद सपने दौडाए हमने....
एक सपने को जिता बाकी सब कहीं दूर छोड़ आए हमने.......

ज़िन्दगी की रेत में चंद चेहरे गहराए हमने.........
कुछ किस्से याद रख्खे कुछ मिट्टी में दफनाये हमने....

मासूमियत के तंदूर में कुछ नाउम्मीदी के कबाब पकाए हमने...
काग़ज़ की रोटी में एक बूँद टाट के पैबंद लगाए हमने....
फिर लहू की चटनी संग एक ढाबे में बेच आए हमने

Muflisi ki daud(race) mein chand (few) sapne daudaye hamne...
ek sapne ko jita baaki sab kaheen door chhod aaye hamne...

zindagi ki ret mein chand (few) chehre (faces) gehraaye hamne....
kuch kisse yaad rakkhe kuch mitti mein dafnaaye hamne....

maasoomiyat ke tandoor mein kuch naummeedi ke kabaab pakaaye hamne..
kaagaz ki roti mein ek boond taat (jute) ke paiband (filler) lagaaye hamne...
phir lahoo ki chatni sang ek dhaabe pe bech aaye humne...

शनिवार, जनवरी 26, 2008

ख़ाक

मुसाफिर बनकर भी ज़मीन्फरोस्त रहा मैं,
अब ज़मीन ही मेरा सफर है...
मौसम दर मौसम...ख्वाहिश दर ख्वाहिश....

रोज़ आते हैं रिंदेयहाँ..जाने किस किस से खफा....
गो खफानावाज़ होता तो हम भी चादर चढा आते
पर चादर तो नही बस इक कफ़न है..मेरा लिबास--ख़ाक ...